Sunday, 3 September 2017

मेरे हमदम के साथ वो हसीन रात




'ये शाम फिर ना आयेगी...' मेरा पसंदीदा गाना, मेरे पसंदीदा रेडियो चैनल पर चल रहा था और मैं  अपनी दुनिया मे अपने साथी के साथ खोई हुई थी| मैं अपने साथी के साथ सब कुछ भूल जाती हूँ, पलकें झपकाना भी|अनानास ही मुस्कुराना, कुछ पल के लिए उसके साथ ही उदास हो जाना, और फिर कभी हॅसना| एक अनोखा बंधन है, उसकी खुशी मे अपनी मुस्कुराहट पा लेती हूँ और गम के साथ थोड़ा रो लेती हूँ| 
पन्नो मे छुपी होती है मेरी खुशियाँ, ग़म और हमसफर 'किताबें'|

     जी हाँ किताबें जिन्हे बे-इंतेहा मोहब्बत करती हूँ| या यूँ कहिए की मेरा सच्चा प्यार तो किताबों से ही है| शायद इसलिए आज तक किसी और को दिल मे जगह नही दे पाई और ना ही ज़िंदगी मे|
आज मैं आपसे अपने सच्चे प्यार के साथ वो हसीन रात के एहसास साझा करने जा रही हूँ| उम्मीद है आपको पसंद आएगी|


"मेरे हमदम के साथ वो हसीन रात"

अक्तूबर का समय था, आमतौर पर मसूरी हमेशा ठंडा ही रहता है लेकिन उस दिन कुछ अजीब सा था हवाओ में| खाना खाकर, करीब 11 बजे आम दिनो की तरह बिस्तर के सिरहाने रखे टेबल लैंप को ऑन किया और जेम्स बॉन्ड पर लिखी एक किताब पढ़ रही थी| उन दिनो मुझे मशहूर लोगो के बारे मे जानने का शौक चढ़ा था|


हवाओं का काफिला और कॉफी का साथ किसी तरह से मुझे किताब मे बाँधे हुए थे| मैं बहुत बोर रही थी|  करीब आधे घंटे बाद मैने हवाओं को अपने बाल सहलाते हुए महसूस किया| अब मेरी आँखे बोझिल होती जा रही थी| अपने अपनी आँखे बंद कर ली| हवाओ ने मेरे कानों मे कुछ कहा, शायद पूछा, 'क्या तुम मेरा इंतज़ार कर रही थी?' एक पल को मैं चौंक गयी और अगले ही पल मेरी आँखों के सामने भयावह दृश्य था| मेरी किताब के दो दिन पन्ने फट चुके थे, बारिश बिना पूछे घर के अंदर दस्तक दे रही थी और तेज़ी से अपना रास्ता तलाश रही थी| मैं गुस्से मे उठी, खिड़की को बंद किया और पानी को रोकने का प्रयास करने लगी |आज पहली बार मुझे पानी से इतनी चिढ़ हुई थी उसने मेरे प्यार का जो हाल किया था उसके लिए मैं उसे ज़िंदगी भर माफ़ नही करती तभी मुझे याद आया सारी ग़लती तो उसकी है|



कहानी 'मेरी डायरी से' जारी है...
आपकी राय का इंतज़ार रहेगा|

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